विद यू; विदाउट यू – पुस्तक समीक्षा

विद यू; विदाउट यू
प्रभात रंजन
प्रेम-प्रेरित उपन्यास
स्टोरी मिरर
29 अक्टूबर 2017
पेपरबैक
280

साहित्य के बिना साहित्य कैसे लिखी जाती है उसीका एक संजीदा उदाहरण है ये पुस्तक!

साहित्यिक विमर्शों में जब आधुनिक हिंदी साहित्य पर बात होती है तो पता नहीं क्यों साहित्य बहुत दूर कोसों पीछे छूट जाती है। खास करके युवा साहित्यकार और उनकी लेखनी तो समझ के परे ही चली गयी है। हिंदी साहित्य में आंग्ल भाषा को जबरदस्ती घुसाने की पुरजोर कोशिश पता नहीं क्यों हो रही है! उनके द्वारा रचित उपन्यास जाने क्यों एक कहानी सी प्रतीत होती है जिसमे एक या दो ही पात्रों के बीच कहानी घूम कर रह जाती है। कहानी आगे बढ़ती है मानो भारतीय मालगाड़ी की तरह और ख़त्म होने वक़्त राजधानी एक्सप्रेस की तरह। पिछले कुछ वर्षो में मैं ने देखा है इनके द्वारा चयनित  बिषय तो बहुत बड़े  होते हैं लेकिन कहानी को उस मुकाम पर ले जाने में ये लोग असमर्थ हो रहे हैं।  

हाल में ही मुझे युवा साहित्यकार प्रभात रंजन द्वारा रचित उपन्यासविद यू विदाउट यूपढ़ने का मौका मिला।  पहली नजर में तो मुझे इस पुस्तक के कवर ने बहुत आकर्षित किया और पढ़ने की इच्छा भी हुई और शायद इसी लिए मैंने दो दिन में ही इसे पूरा पढ़ लिया।  अगर बात की जाये इस कहनी ( मैं इसे उपन्यास नहीं मानता ) की तो मुख्यतः तीन पात्रों के इर्द-गिर्द घूमती है – आदित्य, निशिन्द और रश्मि। तीनों बचपन के दोस्त हैं लेकिन निशिन्द और रश्मि दोनों एकदूसरे के काफी करीबी दोस्त हैं और एक दूसरे के बारे में सबकुछ जानते हैं।  वैसे आदित्य रश्मि से प्यार करता है और रश्मि भी उस से करती है लेकिन विधि के विधान आगे तो किसी की चली है और ही चला, लेकिन इस बीच में अनजाने में इसका कारण निशिन्द बन जाता है और पूरी जिंदगी वो इसी अपराध बोध में गुजारता है।  लेकिन उपर वाले को कुछ और ही मंजूर रहता है।  फिर से निशिन्द और रश्मि मिल जाते हैं और निशिन्द अपने अपराध बोध से भी छूट जाता है।  कहानी मुख्यतः यही है और इसी सन्दर्भ में लिखतेलिखते लेखक ने इसे एक लम्बी कहानी बना दी है।  

अब आते हैं इसके समीक्षात्मक पहलु पर तो कहानी एक निराश सी मालूम होती है जो बहुत धीरेधीरे बढ़ती है।  हालाँकि लेखक ने जिन शहरों का जिक्र किया है उसको बड़े ही वृहत रूप में बताया है चाहे वह लखनऊ हो इलाहबाद हो या फिर गोवा। लेकिन पाठक के रूप में हमें शहर की जानकारी नहीं पात्रों द्वारा कही गयी बातें ज्यादा आकर्षित करती हैं। आधुनिकता से लैस इस कहानी में तो हिंदी साहित्य कहीं दूरदूर तक नजर नहीं आती।  एक भी शाम बिना शराब के बोतल के नहीं गुजरती है। पर इस आधुनिकता का एक विरोधाभाष और भी है जब नागपुर में रश्मि के दोस्त की शादी के दौरान एक घटना घटती है और पढ़ेलिखे होने के बावजूद कोई पुलिस में शिकायत करने के लिए तैयार नहीं होता। ऐसी संकुचित मानसिकता का क्या किया जाये यह एक विचारधीन प्रश्न है और यह एक बात मुझे लेखक की बहुत अच्छी लगी। कहानी आज के युवा दौर से तो कदम मिलाकर चलते हुए प्रतीत होती है लेकिन आधुनिकता की फटी लिवास पहने यह कहानी कुछ और भी सिख देने में अक्षम मालूम होती है।  मुझे तो यह एक साधारण सी प्यार की कहानी प्रतीत होती है जो तीन पात्रों के आपसी प्रेम सम्बन्ध को दिखाती है और तीनों उसके भंवर में फंसे रहते हैं।  कभी अपराध-बोध तो कभी दोस्ती में छिपी वासना को दोस्ती का वास्ता देकर दबा देना बस इन्ही उलझनों में कहानी खत्म हो जाती है।  

वैसे तो लेखक ने अपनी तरफ से पुरजोर कोशिश की है की कहानी को साधारण जोशीले युवा शाहित्यकारों से अलग हटकर प्रेम कथा को नया आयाम दिया जाये लेकिन ये भी वंही फंसे दिखाई देते हैं। अपने साहित्यिक पिछड़ेपन का कई बार उन्होंने उदाहरण अपनी पुस्तक में स्वय ही दे दिया है तो साहित्यिक ढांचा है और ही कोई निष्कर्ष।  

एक बेहतर उपन्यास हमें प्रेरित करता करता है की हम उसे पढ़ें और पूरी तरह खत्म करें और हर पंक्ति को पूरी तरह से समझें और आनंदित हों! हालाँकि, विद यू; विदाउट यू की कहानी पूरी तरह से औंधे मुंह गिर जाती है और हमें बहुत से जगहों पे बेवजह की संवादों को भी पढ़ना होता है जो कहीं न कहीं अपेक्षित हैं! कहानी की गति बहुत ही धीमी है और पटकथा के नाम पर कुछ भी नहीं है जिसपे बात हो सके।  विषयवस्तु तो बस प्रेम ही है – प्रेम आदित्य का जो कहीं  न कहीं शरीर की भूगोलों से प्रेरित है और प्रेम निशिन्द का जो एक हद तक सच्चा है।  और प्रेम कहानियां तो हमें रोज ही पढ़ने को मिल जाती हैं और प्रभात रंजन की किताब भी उसी भीड़ का हिस्सा लगती है!

अन्ततः मैं तो यही कहूंगा की इसी उधेरबुन में पाठक ये समझने में नाकाम होगा की उसने आखिर पढ़ा क्या या तो अपने सामने साहित्य का चीरहरण होते हुआ देखा या फिर एक साधारण सी कहानी पढ़ी जिसका कोई सर पैर  नहीं है।     

समीक्षा – अमित