साहित्य और स्वतंत्रता

बुद्धिजीवी ये बड़े गर्व से कहते हैं की कलाकारों की गरिमा होनी चाहिए एवं कला को स्वतंत्रता मिलनी चाहिए – चाहे वो कुछ भी करें। हाल में ही म्यांमार के एक प्रान्त में हो रहे साहित्य सम्मलेन में ‘फ्री स्प्रीच’ और ‘ह्यूमन राइट्स’ की ‘चेम्पियन’ आंग सां सु की ने कहा की विचारों की स्वतंत्रता इस हद तक भी न होनी चाहिए की एक लेखक बिना सोचे समझे जो मर्जी आये वो लिख दे। और वो सही भी थी। हमने अपने ही देश में कितने ऐसे उदाहरण देखे हैं जहाँ साहित्य के नाम पे समाज का बेतुका चीरहरण हुआ है और बुद्धिजीवी बस यही कहते रह गये की ये तो वैचारिक स्वंतंत्रता की संजीदा उदाहरण है। और ये प्रश्न भी वाजिब उठता है की जो दोयम दर्जे के लेखक हैं वो शारीरिक भूगोल ही बेचें और जो थोड़े राजनैतिक प्रकार से लेखक हैं वो अपने विचारधारा को ही बेचें तो फिर कोई ये बताये स्वतंत्रता तो बस एक कहने की चीज हो गयी। साहित्य में उसका इस्तेमाल हुआ कहाँ?

और आज के बुद्धिजीवियों से हमारा ये आग्रह भी है के कृपया वो बीते हुए कल में भी झांकें और देखें की कब कब विचारों का गाला घोटा गया था और यही लोग चुप्पी साधे हुए थे! साहित्य एक सृजनात्मक भूमिका में होनी चाहिए न की विकारात्मक और न ही विघटनात्मक। अगर एक लेखक अपनी स्वंतंत्रता का पालन करते हुए किसी समुदाय विशेष या किसी व्यक्ति विशेष या किसी भी समूह विशेष पे बिना सोचे समझे और बिना तथ्यों के कुछ भी लिख दे तो उसे हम साहित्य शायद ही कहेंगे। ऐसे साहित्यिक उत्पाद न तो साहित्य की हिस्सा हैं और न ही किसी सभ्य समाज के।

हिंदी भाषा में प्रेमचंद से बड़ा शायद ही कोई होगा (उर्दू के भी दिग्गज थे वो) और उनकी लेखनी भी बड़ी मार्मिक हुआ करती थी लेकिन वो एक सृजनात्मक लेखक थे और उनके द्वारा जो साहित्य में योगदान दिया गया वो आज कल के लेखकों के लिए अनुकरणीय होना ही चाहिए। आप अपनी बातें कहें पर किसी को आहत न करें की आपका साहित्य समाज का दर्पण कम और धमकी ज्यादा हो जाये!

श्रीमान बड़ी समस्या तो ये है की आज साहित्य दो धड़ों में बाँट गया है – वामपंथी साहित्य और दक्षिणपंथी साहित्य। दोनों तरफ से लेखक मानो तलवार लिए खड़ें हों और जैसे एकदम से तत्पर हों वार पे वार करने के लिए! और ये होना तय था मानो क्यूंकि जिस तरह से साहित्य और बुद्धि के कारोबार पर वामपंथियों का कब्ज़ा था दूसरी विचारधारा का आज न कल पनपना मानो लिखा हुआ हो! तो क्या हम इस लड़ाई में साहित्य को पीछे छोड़ दें? ये लेखकों पे जिम्मेदारी है की वो साहित्य को ज्यादा सम्मान देंगे या अपने व्यक्तिगत विचारधारा को। वामपंथी कविताओं में तो सब साफ साफ दीखता है और अब हम बस यही कर सकते हैं की ‘वेट एंड वॉच’.