युवा और कविताओं में उनकी रूचि – विचार

शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसने अपने जीवन काल में कोई भी कविता पढ़ी हो। और युवाओं को तो इससे दूर रखना मानो असंभव प्रतीत हो, कोई दिली  तमन्ना हो या फिर अपने लेखनी से संसार को एक नया आयाम  देना हो दोनों ही जगह युवाओं की रूचि  इसमें बहुत ज्यादा होती है। अपने आप को कविता से दूर रख पाना एक उम्र के बाद मुमकिन नहीं रह जाता है – चाहे वह दिनकर का श्रृंगार रस  हो या फिर अटल जी का वीर  रस। एक अलग सा ही आनंद आता है कविताओं को पढ़कर और हमेशा हम अपने आप को उससे जोड़ने के जदोजहद में दिखते हैं और शायद कविता होती ही ऐसी जिससे हम अपने आप को चाह  कर भी दूर नहीं रख पाते हैं।  

कवितायें तो भावनाओं का ही एक रूप होती है जो भीतर कहीं कोने में हमारे अंदर एक अग्नि सी प्रज्ववलित होती रहती है जरूत है तो बस उसे कविता के प्रति अपने अनुराग में बदलने की और उसके महत्व को संजोने की। चाहे कैसी भी परिस्थिति हो, कविता हमारा साथ कभी नहीं छोड़ती। वक़्त के साथ इंसान तो बदल जाते हैं लेकिन शब्दों की शायद प्रवित्ति ही यही होती है की वो बदले और हमेशा साथ निभाए, एक अनकही दोस्त बनकर!

लेकिन कुछ वाज़िब सवाल हैं मेरे मन में की क्या आज की कविताऍं जो युवाओं द्वारा लिखी जा रही है वो कविता कविता  स्तर के लायक है? अपने प्रेमी या प्रेमिका को दो तीन पंक्ति सुपर्द कर देना ही काव्य का असली मतलब है मुझे यह नहीं लगता हैयह तो बस एक अपनी दिल की तमन्ना होती है जो शब्दों के माध्यम से बयां होती है।  कविताओं का वजूद तो किसी और ही पटल पर टिका होना चाहिए जिसमे एक वृहत सवाल छुपा हो और जो अनेकों  प्रकार के आयामों से सुसज्जित हो।  हाल ही में पटना पुस्तक मेले में दोचार लम्पट कवियों से मुलाकात हुई और उनकी कविता ने तो मुझे हैरत में डाल दिया। क्या यही कविता का अब रूप हो गया है? बहुत ही शर्मिंदा महसूस कर रही थी अपने आप पर की मैं भी कविता लिखती हूँ। उनकी कविता तो ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो  साहित्य के नाम पर किसी सर्प से उसका केचुल निकाल  लिया गया हो। मुझे तो यह बहुत ही विचाराधीन प्रश्न लगा यह की हम क्या से क्या हो रहे हैं। कविता कहीं छूटती सी नजर आ रही है और साहित्य बस एक बोझिल सा सवाल बनके रह गया है जो किसी कोने में रखे धूल फांक रही नागार्जुन की काव्य-संकलन के सामान है – कोई उधर देखता भी नहीं! कविता बस प्रेमी-युगलों के बीच की जाने वाली कामुक शायरी बनके सिमट गयी है युवाओं के बीच और ये एक गलत सन्देश दे रही है!   

हाँ, यह  बात भी सही है की इन सब को करने से युवाओं  की रूचि कविता में बढ़ रही है।  लेकिन इससे हम कविता को एक नया आयाम नहीं दे सकते, इस बात से भी हमें इंकार नहीं करना चाहिए।  खास कर के युवा कविओं को मै  यह कहना चाहूंगी की आप अपनी भावनाओं को व्यक्त करो लेकिन खुद भी उस भावनाओं में नहीं बह जाओ।  आखिर कविताऍं तो साहित्य का ही एक रूप है और अगर हमने इस खूबसूरत सी चीज (कविता को चीज कह देना कहीं बेमानी तो नहीं), को ऐसे ही बदलते परिभाषाओं के दौड़  में गुमनाम या बदनाम हो जाने दिया तो कहीं   कहीं ये आने वाली पीढ़ियों के साथ एक धोखा होगा।  

विचार जीनत के द्वारा