आधुनिकता और हिंदी साहित्य

जब बात आधुनिक हिंदी साहित्य की होती है तो हमारा मन काफी भटकने सा लगता है। हिंदी साहित्य वाले कोने में भी हमें वही किताबें मिलेंगी जो अंग्रेजी लेखकों द्वारा लिखी गयीं हैं एवं हिंदी में अनुवादित करके बस ‘मेकओवर’ कर दिया गया है ताकि हिंदी पाठक भी लुभान्वित हो जाएँ क्यूंकि कहानियां तो सभी सुन ही चुके होते हैं अंग्रेजी वाली किताबों के कुछ खास पन्नों के… तो ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न ये उठता है की वास्तविक हिंदी साहित्य कहाँ है? कहाँ ढूंढें उसे? किस उपन्यास या किस कविता संग्रह को हिंदी साहित्य वाले कोने में जगह दें? और हिंदी वाले कोने में अंग्रेजी साहित्य से हिंदी में रूपांतरित किताबें आयीं कैसे?

आधुनिकता और साहित्य की बात अगर दूसरे स्तर पे भी की जाये तो बहुत सारी बातें बाहर आती हैं। क्या आधुनिकता का मतलब केवल नग्नता है? क्या साहित्यिक आधुनिकता केवल दैहिक भूगोलों तक ही सिमित है? बहुत सारे हिंदी के लेखक भी इस आधुनिकता के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं और जो साहित्य सामाजिक कुरीतियों से लड़ता रहा उसे अब सड़क किनारे बिकने वाले अश्लील पत्रिकाओं के समकक्ष ला खड़ा किया है। क्या ये अंग्रेजी साहित्य की गिरती साखों का असर है? क्या ये वास्तविक में पाठकों की ही पसंद है? आधुनकिता क्या है ये शायद ही आज साफ हो पायेगी क्यूंकि ये एक गंभीर ही नहीं अपितु बहुत असीम संवाद का विषय है।

हाँ, कुछ ऐसे लेखक जरूर हैं जो आज भी अपनी साहित्यिक यात्रा को मर्यादित रखे हुए हैं। हिंदी ऐसे लेखकों का ऋणी है जिन्होंने कहानियों और कविताओं के माध्यम से समाज में सकारात्मक संदेशों का पहुँचाना जारी रखा और कम से कम एक पाठक वर्ग संवेदनशील है उसे असली साहित्य के करीब रखा। हिंदी समीक्षा का पूरा दल ऐसे लेखकों से (समाज के हर हिस्से एवं काल के हर खंड से) पाठकों को रूबरू करवाएगा।

हमें साहित्य से कभी कोई समस्या नहीं हो सकती है। परन्तु, साहित्य के नाम पर हो रहे वैचारिक मजाक और आधुनिकता के नाम पे हो रहे प्रायोगिक चरित्रहीनता से नफरत जरूर है और हम खुले शब्दों में ऐसी चीजों के निंदा करते हैं! वो कहानी, वो उपन्यास या वो कविता जिसमे समाज के लिए कोई सन्देश न हो वो कभी वास्तविक हिंदी साहित्य की हिस्सा हो ही नहीं सकता! अब ये पाठकों को ही तय करना है की वो क्या पढ़ते हैं और क्या नहीं!