पद्मावत – फिल्म समीक्षा

तीन बातें जो याद रह जाएँगी,

संजय लीला भंसाली द्वारा निर्मित,

करणी सेना द्वारा विवादित,

मलिक मोहम्मद जयसी द्वारा रचित,

शाहिद कपूर, दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह द्वारा अभिनीत

इस चलचित्र ‘पद्मावत’ में….और वो हैं—-

राजपूत राजा रावलरतन सिंघ की आन-बाण-शान!

मुस्लिम बादशाह अलाउद्दीन खिलजी का वेह्शिपन, ज़िद और हार!

चितौड़ की महारानी पद्मावती का सौंदर्य, गुण, त्याग और ‘जौहर’ करने की अथाह शक्ति!

करणी सेना ने पूरी हिम्मत और दहशत फैला दी आधे हिंदुस्तान में, तोड़फोड़, आगजनी, यहाँ तक कि खुद को राजपूत कहने वालों ने खुद मासूम बच्चों पर पत्थर बरसा राजपूती आन-बाण-शान को मिटटी में मिला दिया, सिर्फ़ उस इतिहास के सबसे गर्वित बलिदान को आज की पीढ़ी के सामने ना लाया जाये इसलिए. जिस इतिहास में हर राजपूत, औरत, मर्द, या बच्चा अपनी आन के लिए सिर कटने पे बाद भी लड़ता रहा. जिस इतिहास में एक राजपूत रानी ने दुनिया के सबसे वह्शी बादशाह के प्रत्यक्ष हुए बिना उसे हार का स्वाद खुद का बलिदान देकर करवा दिया.

“जो चिंता को तलवार की नोक पर रखे वो राजपूत……..

….. सिर कटने के बाद भी जिसका धड़ भी लड़ता रहे, वो राजपूत!”

वो सिर जो औरत एवं औरों के सम्मान के लिए कटे…वो राजपूत!!!!

करणी सेना की करनी पर झन्नाटेदार थप्पड़ बिना आवाज़ के मारा संजय लीला भंसाली ने.

चुप रह कर कई बदलावों को देखने के बाद भी ‘पद्मावत’ ने आज फिर सही की लाज रख ली।

और करणी सेना अलाउद्दीन खिलजी की तरह आज फिर एक वीरांगना की महाकथा पर बनी मात्र तीन घंटे की एक फिल्म से हार गयी।

वो भव्यता, वो दृढ़ता, वो वैभव, वो अभिमान जो राजपूतों के खून में आज कहीं नहीं दिखता (करणी सेना सम्बन्धित राजपूत), उस शान की हर हद को बाखूबी बरकरार रखा है संजय लीला भंसाली ने ‘पद्मावत’ में।

बात अभिनय की—

  • शाहिद कपूर—

राजा रावलरतन सिंघ के किरदार को पूरी बुलंद आवाज़ से निभाने की कोशिश की है शाहिद कपूर ने. अपनी आवाज़ में भारीपन लाने की कोशिश काफ़ी हद तक कामयाब होती दिखी. उसी शान से चलना, बोलना और वो राजपुताना गुरूर उनकी चाल-ढाल में दिखा जरूर पर ये शाहिद कपूर की पहली ऐतिहासिक फिल्म है और इतिहास को जिंदा करने के लिए उन्हें अभी कई कोशिशें और करनी होंगी, पर कोई शिकन या डर उनकी अदाकारी में नहीं था. बेबाकी से नियत काल की तरह बोले जाने वाले हर डायलॉग को ज्यूँ का त्यूं बोलना भी हर किसी के बस की बात नहीं होती. तो उनकी कोशिश रंग लायी है. खासकर ये डायलॉग—

“चिंता को तलवार की नोक पे रखे
वो राजपूत ..!
रेत की नाव लेके संदर से सर्त लगाए
वह राजपूत ..!
और जिसका सर काटें
फिर भी धड़ दुश्मन से लड़ता रहे
वो राजपूत ..!”

  • दीपिका पादुकोण—-

महारानी पद्मावती के किरदार को अपनी असीम खूबसूरती और अदाकारी से सार्थक कर देने वाली दीपिका पहले भी संजय लीला भंसाली की कई एतिहासिक फिल्मों में अपना जादू बिखेर चुकी हैं. बेशक, आधी दुनिया उन्ही को इस किरदार को निभाते देखने के लिए तत्पर थी. रानी पद्मावती की खूबसूरती, चंचलता, धैर्य, रुआब, साहस, त्याग और सर्वगुण सम्पनता एक ही शक्स में मिल पाना और वो भी आजकल, बेहद मुश्किल होता अगर दीपिका पादुकोण ना होती. वो सादगी से हर पल को निभाती गयी और “रानी पद्मावती” के नाम से एक और इतिहास रच दिया.

क्योंकि दीपिका आँखों से अदाकारी करने में सक्षम हैं तो इसमें कोई दो-राये नहीं कि उनके अलावा कोई भी इस किरदार को इतनी गहरायी और दृढ़ता से निभा पाता.

और मुझे करणी सेना की बेवकूफी अभी भी समझ नहीं आ रही कि बिना देखे ही किसी फिल्म के बारे में राये भी कायम कर ली और उसे रोकने का बवाल भी खड़ा कर दिया. अरे भाई, पहले देखते तो सही कि कितनी सादगी से इस किरदार को जीवंत किया गया है.

खैर, दीपिका के द्वारा बोले गये कई डायलॉग अत्यंत सराहनीय हैं जैसे…

“राजपूती कंगन में भी उतनी ही ताक़त है जितनी राजपूती तलवार में!

या

यहाँ का पत्ता-पत्ता हमारा नाम जानता है.”

पर मेरा पसंदीदा —

“आप ये क्यूँ नहीं सोचतीं कि चौकीदार है, जो न अंदर आ सकता है ना ही अपनी जगह छोड़ के जा सकता है!”

पसंदीदा इसलिए क्योंकि इस डायलॉग में रानी पद्मावती की रानी जैसी सोच ब्यान होती है…जो सही में गलत और गलत में कुछ सही ढून्ढ हो लेती है. राज करने के लिए रानी की ऐसी ही सोच तो चाहिए.

  • रणवीर सिंह—-

ऊपर नरक में बैठा खिलजी भी सोचता होगा कि इसे किस खुदा ने बनाया. रणवीर सिंह ने अलाउद्दीन खिलजी के वेह्शिपन, ज़िद, गन्दी नीयत, पागलपन, जूनून और हार को प्रत्यक्ष सबके सामने ला कर ऐसे खड़ा कर दिया, मानो वो ही अलाउद्दीन खिलजी हो. कुछ कुछ सीन्स में उसका हाव-भाव, उसका उठना-बैठना-बोलना, उसकी आँखों की वो तेज़ धार, सब उस असली खिलजी की बनी तस्वीरों को जीवित कर लायीं. सुना है कि इस किरदार को सटीक निभाने के लिए रणवीर सिंह ने खुद को २१ दिनों तक एक कमरे में बंद कर लिया था, ताकि खिलजी की खिन्नता को हु-ब-हु निभा सके.

और रणवीर ने बेहतर कर दिखाया. वो बेबाकी, वो तीखापन, वो मज़ा और सज़ा का मेल, वो ज़िद, वो सनक, वो विकृत सोच (जिसे ले कर आज न जाने कितने खिलजी घूम रहे हैं), वो एक हब्शी की तरह खाना, वो एक बिगड़े बादशाह का घमंड और फिर एक रानी से हार का डर, ये सब उस असली अलाउद्दीन खिलजी ने भी ऐसे न निभाया होता जैसे कि

आज को छोरो कर गियो !

          “जब खाने में इतना कुछ है तो हम खौफ़ क्यूँ खाएं!”

          हबीबी और बिन्ते दिल पर रणवीर का डांस उसकी अदाकारी में चार-चाँद लगा

          गया. अंत में, पागलों की तरह रानी पद्मावती को पुरे गढ़ में ढून्ढते उसका चीखना,

         जैसे खिलजी ने किया होगा जब एक राजपुताना रानी से शिकस्त खायी होगी.

और अब बात करते है उस काल की “जौहर” की प्रथा की .

जौहर की प्रथा सती की प्रथा से बिलकुल अलग है क्योंकि सती हुआ नहीं जाता था, किया जाता था क्योंकि उस वक़्त औरत के पति के मर जाने पर दूसरी शादी नहीं करवाई जाती थी. पर, जौहर खुद एक औरत स्वयं की मर्ज़ी से कर सकती थी. और महारानी पद्मावती का जौहर राजपूताना आन के साथ-साथ खुद की इज्ज़त के लिए भी किया गया था. इज्ज़त से बढकर जान नहीं होती, ये बात जीवंत की गयी है इस फिल्म में. रानी पद्मावती चाहती तो तलवारबाजी में निपुण होते अलाउद्दीन से लड़ भी लेती पर हर वीरांगना नहीं लड़ पाती क्योंकि हर कोई महारानी पद्मावती जैसी दृढ़-निश्चित नहीं थी. अपनी इज्ज़त को एक विकृत सोच के खूखार दरिन्दे से बचाने को उन्होंने ‘जौहर’ का फैसला लिया. ना कि किसी खौफ़ या खुद की खूबसूरती को छुपाने को. वो चाहती थी कि भले ही अलाउद्दीन खिलजी सारे जग से जीत जाये पर मरते दम तक ये हार न भूले कि वो एक औरत से उसकी इज्ज़त, उसका अभिमान नहीं छीन पाया और इतिहास उसे एक वीरांगना से हारे हुए मुस्लिम बादशाह के रूप में याद रखे जो भरसक कोशिशों के बाद भी महारानी पद्मावती का चेहरा तक भी न देख पाया था, उसे छूना तो दूर की बात थी और पाना तो असम्भव!

जौहर की उस प्रथा को पूर्ण तरीके से दिखाया और फिल्माया गया है. ज़रा सी लौ छू जाये तो वो जला घाव कई दिन खुद की याद दिलाता रहता है तो कितनी हिम्मत की होगी उन वीरांगनाओं ने उस अग्नि-कुण्ड में कूदने की. और वो भी स्व-इच्छा से. मुस्कुराते हुए. गर्व से गर्व के लिए!

अगर ऐसे इतिहास को छुपाने को करणी सेना ने इतना हो-हल्ला किया था तो लानत है ऐसी सेना पे जो एक गर्वित महारानी के इतिहास के अब तक के सबसे बड़े और सशक्त बलिदान को आज की पीढ़ी की सोच से दूर रखना चाह रही थी।

नमन है मेरा उन वीरांगनाओं को और हंसी आ रही है आज ये सोच कर कि कितना चीखा होगा अपनी हार पर खिलजी जो ये चाहता था कि दुनिया उसे सबसे बड़े मुस्लिम बादशाह के नाम से याद रखे.

याद तो अब भी रखेगी पर…

एक हिन्दुस्तानी औरत से हारे एक मामूली बादशाह की तरह!!!

 

लेखक – पलक कुंद्रा

(पलक एक लेखिका हैं और इनकी प्रथम पुस्तक ब्लीडिंग क्वींस के लिए इन्हें सर्वश्रेस्थ उपन्यासकार का सम्मान भी मिला है)

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